Thursday, August 26, 2010

फेस क्रीम से पेन रिलिफ़ तक


बचपन में जब गली में अपने दोस्तो के साथ खेला करती थी, तब से शीला आंटी को देख रही हूं...उन्हें बच्चों से बेहद लगाव था,अक्सर वो हमें अपने घर ले जाया करती थी ! हम सभी खूब मस्ती किया करते थे...आंटी को सजने संवरने का बेहद शोक था ! एक दिन हम सभी खेल रहे थे कि अमर अंकल (शीला आंटी के पत्ति) घर फिल्म की दो टिकटें लेकर आए और आंटी को कहा चलो फिल्म देखने चलते है..आंटी बहुत खुश हो गई और जल्द से तैयार भी...घर से निकल ही रहे थे कि अचानक आंटी ने अकंल को कहा कि रुको मैंने फेस क्रीम तो लगाई नहीं..अंकल को पहले गुस्सा तो आया, लेकिन बाद में आंटी को देख के शांत भी हो गया...वो फिल्म देखने चले गए और हम बच्चे अपने अपने घर....अगले ही दिन आंटी ने बताया कि हम लोग रांची शिफ्ट हो रहे है क्योंकि अंकल की जॉब ट्रांसफर हो रही है..आंटी जहां एक और अंकल की तरक्की से खुश थी वही दूसरी ओर हम बच्चों से अलग होने से दुखी भी थी..हम उस वक्त बहुत छोटे थे तो हम सभी बच्चों ने रोज़ की मिलने वाली जेब खर्ची में से कुछ पैसे बचा कर आंटी को गिफ्ट देने की सोची, काफ़ी सोचने के बाद हम बच्चों ने एक गिफ्ट लिया और पैक करवा कर आंटी को दिया..आंटी ने जैसे ही गिफ्ट खोला, खोलते ही हम बच्चों को गले से लगा लिया, आखिंर गिफ्ट जो था...आंटी की फेवरट फेस क्रीम, आंटी अंकल रांची चले गए और धीरे धीरे हम अपनी अपनी ज़िंदगी में मस्त हो गएकल ही रात को मां के साथ किचन में मां का हाथ बट्टा रही थी कि मां ने अचानक कहा..अरे बेटा वो शीला आंटी नहीं थी जो हमारे घर के सामने रहती थी, जिनके पति का रांची मे में जॉब ट्रांसफर हो गया था (मां शायद डिटेल में इसलिए बता रही थी, क्योंकि उस वक्त मैं महज 5-6 साल की थी, तो मां को लगा कि मैं भूल गई होंगी, लेकिन कुछ रिश्ते खून के न होते हुए भी बहुत खा़स होते हैं ) तो मैंने मां से कहा कि हां मां अच्छे से याद है, क्या हुआ उन्हें ? मां ने कहा कि बेटा अमर अंकल की वापिस दिल्ली में जॉब ट्रांसफर हो गया हैं...उस वक्त मन तो किया कि भाग कर जाऊ और आंटी से खूब बाते करुं...लेकिन रात काफ़ी हो गई थी..अगले दिन मुझे ऑफिस भी जल्दी जाना था तो सुबह भी नहीं मिल पायी..शाम को ऑफिस से घर आते वक्त सोचा कि आंटी के लिए कुछ ले लू..तो उनके लिए फेस क्रीम से अच्छा गिफ्ट क्या होता, तो वहीं ले लिया...शाम को मैं सीधा शीला आंटी के घर ही पहुंची ! आंटी ने मुझे पहचाना ही नहीं, क्योकि बचपन में जो देखा था मुझे..लेकिन जैसे ही मैंने उनको गिफ्ट दिया और धीमे से कहा शीला आंटी मैं नवनीत..ये सुनते ही आंटी ने मुझे इस कदर गले लगाया जैसे मैं उनकी ही बेटी हूं, जिसे काफी लंबे वक्त बाद वे मिली थी,गले लगा कर मुझे खूब प्यार किया, कितने सवाल किए कि मैं क्या करती हूं, कहां जाती हूं, कितने बजे वापिस आती हूं ? वगैरह वगैरह ! हम बातें कर ही रहे थे कि अचानक आंटी को याद आया कि उनकी दवा का टाइम हो गया है तो आंटी ने अपनी दवा की पोटली खोली जिसमें तकरीबन हर रंग की गोली थी, मेरे पूछने पर आंटी ने बताया कि ये जोड़ो के दर्द की दवा हैं और हंसते हुए कहा कि बेटा अब मुझे फेस क्रीम की नहीं कोई पेन रिलिफ़ क्रीम गिफ्ट करना क्योकि अब पेन रिलिफ़ क्रीम के बिना हिला भी नहीं जाता, और हम ज़ोर से हंसने लगे...रात काफी़ हो गई थी तो मैं अपने घर आ गई और खाना खा के सोने चली गई,बैड पर जा के सोचा कि आंटी का फेस क्रीम से पेन रिलीफ़ तक का इतना लम्बा सफ़र सिर्फ यादों में ही निकल गया...

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