Thursday, April 14, 2011

जी चाहता है...

कभी अपनी हंसी पर आता है गुस्सा कभी सारे जहां को हंसाने को जी चाहता है... कभी छुपा लेती हूं गमों को किसी कोने में कभी किसी को सब कुछ सुनाने को जी चाहता है... कभी हंसती हूं किसी के कहने पर कभी यू ही आंसू बहाने को जी चाहता है... कभी अच्छा लगता है है आज़ाद घुमना कभी किसी बंधन में बंध जाने को जी चाहता है... कभी लड़ती हूं खुदा से ऐसे ही बेवजह कभी उस खुदा को ही मनाने को जी चाहता है... कभी लगती है ये ज़िदगी बढ़ी हसीन सी तो कभी ज़िंदगी से ही उठ जाने को जी चाहता है...

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