Friday, October 8, 2010

तुझे भुला दिया...


बचपन की नादानी मे एक भूल सी मुझसे हो गई
एक अनजाने को अपना समझ, प्यार के सपने संजो गई

उससे मिलना- जुलना बाते करना अच्छा लगने लगा
दूसरी ओर मेरी ज़िंदगी मे नर्क का दरवाज़ा खटकने लगा

न मुझे उससे प्यार था, न उससे कोई उम्मीद
बस इन्ही बातों बातों मे, कई महीने गए थे बीत

कुछ दोस्तों ने मेरी दोस्ती को प्यार का नाम दे दिया
उस मनचले ने भी इस दोस्ती को प्यार रूप मे ले लिया

ये दोस्ती "मा-पा" के दिमाग मे कई सवाल बो गई
फ़िर रीति- रिवाज़ और संस्कृति मे ये दोस्ती कही खो गई

एक गलती से मुझसे मेरी हंसी खुशी सब रुठ गई
मां की ममता, पा का प्यार, दोस्तों की दोस्ती न जाने कहां छुठ गई

रात के अंधेरे मे रो - रो कर पश्चाताप करती रही
कही पापा भाई कोई देख न ले, इस बात से भी डरती रहीं

न जाने प्यार नाम से मैंने क्यों डर इतना पाया हैं
सपनें, मा- पा, हंसी खुशी सभी कुछ गवाया हैं

न जाने प्यार इश्क मोहब्बत जैसे नामों से क्यों चीढ़ सी मुझे हो गई है
कभी मा- पा को वापिस पा पाऊंगी, ये उम्मीद भी कहीं खो गई हैं

अपनों की दिल दुखा कर, दोस्तो को भुला कर न जाने कहां जाऊंगी
पर हां, ज़िंदगी मे मैं कभी "प्यार" को न समझ पाऊंगी

2 comments:

  1. Bahut hee Khoob likha...
    Aisa laga kitna Dard hai aapke Man me
    Very Good

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  2. जब आपने अपने मनोभावों को शब्दों में पिरोने की हिम्मत कर दी है तो फिर आगे बढ़ते रहिए. जो बीत गई सो बात गई. आत्मविश्वास कायम रखिए. अगर आपको लगता है कि वो प्यार न होकर बचपन की भूल थी, नादानी थी और सिर्फ आकर्षण था तो परेशानी कैसी. भूल जाइए वो सब.

    मा-पा, भाई आपसे कभी दूर नहीं गए. बस संवादहीनता के कारण अविश्वास की दीवार बन गई है. ये दीवार तब टूट जाएगा जब आप पहल करेंगी. इंसान आत्मविश्वास के बल पर बहुत कुछ कर सकता है. फिर से शुरुआत कीजिए और खुद को साबित कीजिए.

    और हां, प्यार भी मिलेगा.... ये चिढ़ भी मिटेगी...

    शुभकामनाएं.... :)

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